मेरे तुम्हारे जुगनू

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ये जो हैं चमकते हुए जुगनू
हँसते मुस्कुराते तुम्हारे इर्द गिर्द मंडराते
तुम इन्हें बंद तो नहीं कर देते
अपनी हिचक के अँधेरे डब्बे में

ये तुम्हे कहते हैं
जियो उमंग के साथ
तुम्हारी हिचक कहती है
जिम्मेदारियों में उमंग कहाँ

ये तुम्हे कहते हैं
रहो बाज़ की तरह उन्मुक्त
तुम्हारी हिचक कहती है
लोग क्या कहेंगे

ये तुम्हे कहते हैं
जो मन न माने तो ना करो
तुम्हारी हिचक कहती है
यही तो दुनियादारी है

तो सुनो इन जुगनुओं की बात
ज़िम्मेदारी, लोकलाज, दुनियादारी
जिस हिचक के अँधेरे डब्बे में हैं
उसे फेंक दो अपनी दुनिया से दूर

इन जुगनुओं को अपने अन्दर की रौशनी
अपने चमकते खिलखिलाते जादू से
तुम्हारा जीवन बदलने दो
तुम्हे जीना सिखाने दो

© June 2018 Sapna Dhyani

 

Author: Sapna Dhyani

I am Sapna Dhyani. I write about everything that crosses my mind. I write about life as I see it and like to infuse humour into my blogs. I belong to Dehradun but now live in a new city after every two years, being an army wife. This uprooting of base every couple of years, setting up a new home in a new place, meeting new people and forging new friendships, exploring new cities; all this ensures that I go through and am blessed with a myriad of experiences.

10 thoughts on “मेरे तुम्हारे जुगनू”

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